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‘Mixed Farming’ means / ‘मिश्रित खेती’ का अर्थ है

‘Mixed Farming’ means / ‘मिश्रित खेती’ का अर्थ है

 

(1) Sowing of both cash and food crops / नकदी और खाद्य फसलों दोनों की बुवाई
(2) Sowing of two or more crops in the same field. / एक ही खेत में दो या दो से अधिक फसलों की बुवाई।
(3) Sowing of two or more plants in alternate years. / वैकल्पिक वर्षों में दो या दो से अधिक पौधों की बुवाई।
(4) Rearing of cattle and agriculture. / पशुपालन और कृषि।

(SSC (10+2) Level Data Entry Operator & LCD Exam. 04.12.2011)

Answer / उत्तर : –

(4) Rearing of cattle and agriculture. / पशुपालन और कृषि।

Sustainable Agriculture: Mixed cropping, Crop rotation, Mixed Farming - PMF IAS

Explanation / व्याख्यात्मक विवरण :-

Mixed farming is the combining of two independent agricultural enterprises on the same farm. A typical case of mixed farming is the combination of crop enterprise with dairy farming or in more general terms, crop cultivation with livestock farming. Mixed farming may be treated as a special case of diversified farming

If the farmer cultivates another crop along with one crop, then such cultivation is known as mixed cropping. At the same time, when animal husbandry is done along with the production of crops, then such farming is called mixed farming.

What is meant by mixed farming?

Mixed farming is a type of diversified farming. Mixed farming is that important farming, in which mainly crop production and animal husbandry are completely dependent on each other. In this system of farming, along with crop production, animal husbandry can also be done, by doing so equal benefits are obtained from both. The farming done in this way is called mixed farming.

Animals are used as a supplementary occupation in mixed farming. Along with crop production, keeping animals on the farm, in addition to the benefits of milk and agricultural works, manure is also obtained, using which the loss of fertile power of the land can be prevented.

benefits of mixed farming

1. In mixed farming, the dung and urine obtained from animals increases the fertile power of the land.

2. By doing this type of farming, income is received regularly for most part of the year.

3. By-products obtained from the main businesses, straw, straw, agoula and dung, urine etc. are all fully utilized.

4. The farmer doing mixed farming and his family members get regular work throughout the year.

5. Proper use of land, labor and capital is done from the economic point of view.

6. By doing this farming, the farmers get more net income per acre than other types of agriculture, because the overhead charges are divided on many substances throughout the year, due to which the production of crops and animals is reduced. The expenditure per unit becomes relatively less.

7. The farmer gets a nutritious and balanced diet in the form of various items – milk, curd, ghee, whey, egg, fruit, vegetable for use from animal husbandry.

What are the disadvantages of mixed cropping?

(i) The farmers doing this farming have difficulty in weeding and plowing the crops.

(ii) Farmers also face difficulty in using advanced machines.

(iii) To do this farming, it is necessary for the farmers to have different weed destroyers or machines for different crops, for which they have a lot of difficulty.

(iv) After doing this farming, farmers also have to face inconvenience in harvesting its crops.

(v) Pure seeds for the future cannot be easily obtained by cultivating mild crops.

Precautions for cultivation of mixed crops

(i) For the cultivation of mixed crops, the farmers have to choose the crops keeping in mind the soil, climate and availability of irrigation for the particular area.

(ii) While doing this farming, special care has to be taken that there should not be much competition among the crops grown for nutrients, sunlight, moisture and space.

(iii) Farmers have to use one crop with shallow roots and the other with deep roots for mixed farming, and the height of the crops grown together should be unequal.

Principles of Mixed Cropping

The selection of different crops to be included in crop rotations is determined by many factors. Their brief description is as follows –

1. Climate – Farmers should plan keeping in mind the particular climate of that area while choosing crops for mixed farming mainly.

2. Land related factors – Farmers need to choose the crops to be sown keeping in mind the factors like the type of particular land of that area, its composition, structure, air circulation and availability of water, because if you do not do so If you do, you may also suffer crop loss.

3. Irrigation water – In addition to rain water, farmers should keep the facility of irrigation water while choosing crops.

4. Economic benefits – Farmers should get more profit from the benefits of mixed crops than one crop.

5. Competitive nature – Farmers should keep this in mind while doing this farming, that the crops grown in mixed farming should not compete for solar energy, soil moisture, space and nutrients etc.

6. Availability of Nutrients – In mixed farming, farmers should use one crop with extra roots and the other crop with deep root.

7. Nature of growth – Farmers should sow one crop spread on the land in the crops taken in mixed farming, and the seeds of the second crop should be used directly. By doing this, both the crops get the same form of carbon dioxide (CO2) and light etc. from these different nature of growth.

मिश्रित खेती एक ही खेत पर दो स्वतंत्र कृषि उद्यमों का संयोजन है। मिश्रित खेती का एक विशिष्ट मामला डेयरी फार्मिंग के साथ फसल उद्यम का संयोजन है या अधिक सामान्य शब्दों में, पशुधन खेती के साथ फसल की खेती। मिश्रित खेती को विविध खेती का एक विशेष मामला माना जा सकता है

एक फसल के साथ यदि किसान दूसरी फसल की भी खेती करता है, तो ऐसी की जाने वाली खेती को मिश्रित फसल के नाम से जाना जाता है। वहीँ फसलों के उत्पादन के साथ-साथ जब पशुपालन भी किया जाता है, तो ऐसी खेती को मिश्रित खेती कहते हैं।

मिश्रित खेती का क्या मतलब होता है

मिश्रित खेती एक प्रकार से विविध खेती होती है। मिश्रित खेती वह महत्वपूर्ण खेती होती है, जिसमें मुख्य रूप फसल उत्पादन व पशुपालन एक – दूसरे पर पूर्ण रूप से निर्भर करता है। खेती की इस प्रणाली में फसल उत्पादन के साथ – साथ पशुपालन का भी काम किया जा सकता है, ऐसा करने से दोनों से बराबर लाभ प्राप्त किया जाता है । इस तरह से की जाने वाली खेती को मिश्रित खेती कहा जाता है।

मिश्रित खेती में पशुओं का इस्तेमाल एक पूरक व्यवसाय के रूप में किया जाता है । फसल उत्पादन के साथ-साथ पशुओं के रखने से फार्म पर दूध व कृषि कार्यों के लाभ के अतिरिक्त खाद भी प्राप्त हो जाती है, जिसका इस्तेमाल करके भूमि की उपजाऊ शक्ति की क्षति को रोका जा सकता है ।

मिश्रित खेती के लाभ

1. मिश्रित खेती में पशुओं से प्राप्त होने वाले गोबर व मूत्र से भूमि की उपजाऊ शक्ति में वृद्धि होती है ।

2. इस तरह की खेती करने से वर्ष के अधिकांश भाग में आय नियमित रूप से प्राप्त होती रहती है ।

3. मुख्य व्यवसायों से प्राप्त उप — फलों (By — Products ) भूसा , पुआल , अगौले व गोबर , मूत्र आदि सभी का पूरी तरह से उपयोग कर लिया जाता है ।

4. मिश्रित खेती करने वाले कृषक तथा उसके पारिवारिक सदस्यों को वर्ष भर नियमित रूप से कार्य मिलता रहता है ।

5. आर्थिक दृष्टिकोण से भूमि, श्रम व पूँजी का समुचित प्रयोग कर लिया जाता है ।

6. यह खेती करने से किसानो को शुद्ध आय प्रति एकड़ कृषि के अन्य प्रकार की अपेक्षा इसमें अधिक प्राप्त हो जाती है, क्योंकि ऊपरी व्यय (Overhead Charges) वर्ष भर में अनेक पदार्थों पर विभाजित कर दिये जाते है, जिससे फसल तथा पशु उत्पादन की प्रति इकाई पर व्यय अपेक्षाकृत कम हो जाता है ।

7. पशुपालन से उपयोग के लिये कृषक को विभिन्न वस्तुओं — दूध, दही, घी, मट्ठा, अंडा, फल, सब्जी के रूप में एक पौष्टिक व संतुलित आहार प्राप्त हो जाता है ।

मिश्रित फसल से क्या हानि है ?

(i) इस खेती को करने वाले किसानो को फसलों की निराई – गुड़ाई में कठिनाई होती है ।

(ii) किसानो को उन्नत यंत्रों के प्रयोग में भी कठिनाई होती है ।

(iii) इस खेती को करने के लिये किसानो के पास अलग – अलग फसलों के लिये अलग – अलग खरपतवार विनाशक दवाइयां या फिर यन्त्र होना आवश्यक होता है, जिसके लिये उन्हे बहुत ही कठिनाई होती है |

(iv) किसानो की इस खेती को करने के बाद इसकी फसलों की कटाई में भी असुविधा का सामना करना पड़ता है।

(v) मिलवाँ फसलों की खेती से भविष्य के लिए शुद्ध बीज आसानी से नही प्राप्त कर सकते है।

मिश्रित फसलों की खेती के लिये सावधानियाँ

(i) मिश्रित फसलों की खेती के लिये किसानो को फसलों का चुनाव क्षेत्र विशेष की मिट्टी, जलवायु तथा सिंचाई की उपलब्धता को ध्यान में रख कर करना होता है ।

(ii) इस खेती को करते समय उगाई जाने वाली फसलों में आपस में पोषक तत्वों , सूर्य की रोशनी, नमी तथा स्थान के लिये अधिक स्पर्धा न हो इस बात का विशेष ध्यान रखना होता है।

(iii) किसानो को मिश्रित खेती करने के लिये एक फसल उथली जड़ों वाली तथा दूसरी गहरी जड़ों वाली का इस्तेमाल करना होता है, और साथ में उगाई जाने वाली फसलों की ऊँचाई असमान होनी चाहिये।

मिश्रित फसल के सिद्धान्त

फसल चक्रों में सम्मिलित करने के लिये विभिन्न फसलों का चुनाव बहुत से कारकों द्वारा निर्धारित किया जाता है । इनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार से है –

1.जलवायु – किसानो को मुख्य रूप से मिश्रित खेती करने के लिये फसलों का चुनाव करते समय उस क्षेत्र की विशेष जलवायु को ध्यान में रखकर योजना बनानी चाहिये।

2. भूमि सम्बन्धी कारक – किसानो को उस क्षेत्र की विशेष भूमि की किस्म, उसकी रचना, संरचना, वायु संचार एवं जल की उपलब्धता आदि कारकों को ध्यान में रखते हुऐ बोई जाने वाली फसलों का चयन करना आवश्यक होता है, क्योंकि यदि आप ऐसा नही करते है, तो आपको फसल में नुकसान भी हो सकता है ।

3. सिंचाई जल – फसलों का चुनाव करते समय किसानो को वर्षा जल के अतिरिक्त सिंचाई जल की सुविधा भी रखनी चाहिये ।

4. आर्थिक लाभ – किसानो को मिश्रित फसलों के होने वाले लाभ से एक फसल की तुलना में अधिक लाभ प्राप्त होना चाहिये ।

5. प्रतिस्पर्धात्मक स्वभाव – किसानो को इस खेती को करते समय इस बात को ध्यान में रखना चाहिये, कि मिश्रित खेती में उगाई जाने वाली फसलों में सौर – ऊर्जा , मृदा नमी , स्थान तथा पोषक तत्वों आदि के लिये प्रतिस्पर्धा नहीं हो ।

6. पोषक तत्वों की उपलब्धता – मिश्रित खेती में किसानो को एक फसल अपस्थानिक जड़ो वाली तथा दूसरी फसल गहरी जड वाली का प्रयोग करना चाहिये ।

7. वृद्धि का स्वभाव – किसानो को मिश्रित खेती में ली गई फसलों में एक फसल भूमि पर फैलकर चलने वाली बोनी चाहिये, तथा दूसरी फसल सीधी बढ़ने वाली के बीजो का इस्तेमाल करना चाहिये| ऐसा करने से वृद्धि के इन भिन्न स्वभावों से कार्बन डाई आक्साइड (CO2) तथा प्रकाश आदि की प्राप्ति दोनों फसलों को समान रूप प्राप्त होती रहती है |

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