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Social forestry is / सामाजिक वानिकी है

Social forestry is / सामाजिक वानिकी है

 

(1) growing different types of plants together on private land / निजी भूमि पर विभिन्न प्रकार के पौधे एक साथ उगाना
(2) management of forest by cooperative societies / सहकारी समितियों द्वारा वन प्रबंधन
(3) growing one type of plant in government owned land / सरकारी स्वामित्व वाली भूमि में एक प्रकार का पौधा उगाना
(4) growing and management of useful plants on government owned land / सरकारी स्वामित्व वाली भूमि पर उपयोगी पौधों को उगाना और उनका प्रबंधन करना

(SSC (10+2) Level Data Entry Operator & LCD Exam. 11.12.2011)

Answer / उत्तर : –

(4) growing and management of useful plants on government owned land / सरकारी स्वामित्व वाली भूमि पर उपयोगी पौधों को उगाना और उनका प्रबंधन करना

What is Social Forestry? | RECOFTC

 

Explanation / व्याख्यात्मक विवरण :-

Social forestry means the management and protection of forests and afforestation on barren lands with the purpose of helping in the environmental, social and rural development. Under social forestry, trees are planted in village common land, Government wasteland and Panchayat land. Through the social forestry scheme, the government has involved community participation, as part of a drive towards afforestation, and rehabilitating the degraded forest and common lands.

Meaning of Social Forestry:
In the interest of social forestry, rural and urban communities, plantation and tree growing is called on any government land, village society farmer’s private land or any other area land outside the areas of natural forests.

Social forestry is also called community forestry. Community forestry is carried out in the village on the land of the village society. Community forestry is defined as ‘of the people, for the people, by the people’.

The importance of social forestry was emphasized in the National Forest Policy of 1952 and 1988. Social forestry has many other and indirect benefits to the people in addition to wood, fodder and grass for fuel, such as micro-climate, more rainfall, soil conservation, reduction of soil erosion and make the ecosystem in a sustainable state. Keep .

Many social values ​​are associated with the ecosystem, including cultural, spiritual, social, economic, medicinal, ecological, leisure and aesthetic sense.

Although the purpose of social forestry is done to benefit all sections of the society, but it is not properly maintained and the trees planted are destroyed quickly, hence it is also named ‘Common Tragedy’.

Objectives of Social Forestry:

The objectives of social forestry are as follows:

1. To increase the productivity of cropping models, conserve soil, conserve water and make good use of it.
2. To prepare wood, wood, bamboo and pasture for animals for fuel for the people.
3. Using the leaves of trees as fodder for cows, buffaloes and sheep.
4. To obtain oil from the leaves of the trees and resins etc. from the trees.
5. To increase the farm-land fertility by preparing and using cow dung manure from animal husbandry.
6. To provide new employment opportunities to the rural people.
7. To provide raw material for paper industry and wood for pulp.
8. Providing wood for agricultural implements.
9. To encourage cottage industry in the village.
10. Use of land according to its productive capacity.
11. To conserve soil and water.
12. To provide protection to the natural habitats of Scheduled Tribes.
13. Providing entertainment facilities.
14. To protect the visuals of aesthetics.
15. To be helpful in sustainable rural development.
16. Protecting agriculture while conserving ecological diversity.

Components of Social Forestry:

Social forestry has the following components:

1. Agro-Forestry or Silviculture:

Many farmers plant trees on the borders of their fields and some farmers grow trees as crops throughout the field.

2. Extension Forestry:

Planting trees away from traditional natural forests in such barren areas where there is no vegetation is called extension forestry.

3. Mixed Forestry :

In mixed forestry, crops of cereals or thieves are grown along with trees in the field. It is often grown on the land of village society.

4. Shelter Forestry:

Often in desert or semi-desert areas, trees are planted in the form of shelter belts to prevent soil erosion.

5. Plantation on Linear Landstrip:

Fast growing trees are planted on the linear strips of land along the banks of roads, railways, canals etc. This is also called social forestry.

6. Reforestation of Degraded Forests:

Plantation by humans in such areas of forests from which a large number of trees have been cut or burned is called reforestation of degraded forests.

7. Pleasure Forestry :

This type of social forestry is often applied in parks and recreation places. This type of forestry is also known as Aesthetic Forestry.

The following trees are considered suitable for social forestry:

Odor white or eucalypts, poplar, jamun, cirrus, rosewood, tamarind, plum, senji etc.

सामाजिक वानिकी का अर्थ है पर्यावरण, सामाजिक और ग्रामीण विकास में मदद करने के उद्देश्य से बंजर भूमि पर वनों का प्रबंधन और संरक्षण। सामाजिक वानिकी के अंतर्गत गांव की सामान्य भूमि, शासकीय बंजर भूमि एवं पंचायत भूमि में वृक्षारोपण किया जाता है। सामाजिक वानिकी योजना के माध्यम से, सरकार ने वनीकरण की दिशा में एक अभियान के हिस्से के रूप में, और अपमानित वन और आम भूमि के पुनर्वास के लिए सामुदायिक भागीदारी को शामिल किया है।

सामाजिक वानिकी का अर्थ :

सामाजिक वानिकी, ग्रामीण एवं नगरीय समुदायों के हित में, प्राकृतिक वनों के क्षेत्रों के बाहर किसी सरकारी भूमि, ग्राम समाज किसान की निजी भूमि अथवा किसी अन्य क्षेत्र की भूमि पर वृक्षारोपण एवं वृक्ष उगाने को कहा जाता है ।

सामाजिक वानिकी को समुदाय वानिकी भी कहते हैं । गाँव में समुदाय वानिकी ग्राम समाज की भूमि पर लगाई जाती है । समुदायिक वानिकी को ‘लोगों की, लोगों के लिये, लोगों द्वारा’ के तौर पर परिभाषित किया गया है ।

वर्ष 1952 तथा 1988 की राष्ट्रीय वन नीति में सामाजिक वानिकी के महत्व पर बल दिया गया था । सामाजिक वानिकी से लोगों को ईधन हेतु लकड़ी, चारे और घास के अतिरिक्त बहुत-से अन्य एवं अप्रत्यक्ष लाभ हैं, जैसे-व्यष्टि-जलवायु, वर्षा का अधिक होना, मिट्‌टी संरक्षण, मिट्‌टी के अपरदन में कमी तथा पारिस्थितिकी तन्त्र को टिकाऊ अवस्था में बनाये रखना ।

पारिस्थितिकी तन्त्र के साथ बहुत-से सामाजिक मूल्य जुड़े हुये है, जिनमें सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक, औषधिय, पारिस्थितिकीय, आमोद-प्रमोद और सौन्दर्य बोध सम्मिलित हैं ।

यद्यपि सामाजिक वानिकी का उद्देश्य समाज के सभी वर्गों को लाभ पहुँचाने के लिये किया जाता है, परन्तु इसकी देख-रेख सही तौर पर नहीं हो पाती और लगाये गये वृक्ष जल्द नष्ट हो जाते हैं इसलिये इसको ‘साझी त्रासदी’ नाम भी दिया जाता है ।

सामाजिक वानिकी के उद्देश्य :

सामाजिक वानिकी के उद्देश्य निम्न प्रकार हैं:

1. फसल मॉडल की उत्पादकता बढ़ाने के लिए, मिट्टी का संरक्षण, जल संरक्षण और इसका अच्छा उपयोग करना।
2. लोगों के लिए ईंधन के लिए जानवरों के लिए लकड़ी, लकड़ी, बांस और चारागाह तैयार करना।
3. पेड़ों की पत्तियों का गाय, भैंस और भेड़ के चारे के रूप में उपयोग करना।
4. वृक्षों की पत्तियों से तेल और वृक्षों से राल आदि प्राप्त करना।
5. पशुपालन से गोबर की खाद तैयार कर प्रयोग कर खेत-भूमि की उर्वरता बढ़ाना।
6. ग्रामीण लोगों को रोजगार के नए अवसर प्रदान करना।
7. कागज उद्योग के लिए कच्चा माल और लुगदी के लिए लकड़ी उपलब्ध कराना।
8. कृषि उपकरणों के लिए लकड़ी उपलब्ध कराना।
9. गांव में कुटीर उद्योग को बढ़ावा देना।
10. भूमि का उपयोग उसकी उत्पादक क्षमता के अनुसार करना।
11. मिट्टी और पानी के संरक्षण के लिए।
12. अनुसूचित जनजातियों के प्राकृतिक आवासों को संरक्षण प्रदान करना।
13. मनोरंजन सुविधाएं प्रदान करना।
14. सौंदर्यशास्त्र के दृश्यों की रक्षा करना।
15. सतत ग्रामीण विकास में सहायक होना।
16. पारिस्थितिक विविधता का संरक्षण करते हुए कृषि की रक्षा करना।

सामाजिक वानिकी के संघटक :

सामाजिक वानिकी के निम्न संघटक हैं:

1. कृषि वानिकी अथवा सिल्वीकल्चर :

बहुत-से किसान अपने खेतों की सीमाओं पर पेड़ लगाते हैं और कुछ किसान पूरे खेत में पेड़ों को फसलों के तौर पर उगाते हैं ।

2. विस्तार वानिकी :

परम्परागत प्राकृतिक वनों से दूर ऐसे बन्जर क्षेत्रों में पेड़ लगाना जहाँ वनस्पति नहीं है विस्तार वानिकी कहलाती है ।

3. मिश्रित वानिकी :

मिश्रित वानिकी में खेत में वृक्षों के साथ-साथ आनाज अथवा चोर की फसलें उगाई जाती हैं । यह प्राय: ग्राम समाज की भूमि पर उगाई जाती है ।

4. आश्रय वानिकी :

प्राय: मरुस्थली अथवा अर्द्ध-मरुस्थली क्षेत्रों में मृदा अपरदन को रोकने के लिये शेल्टर बेल्ट (Shelter Belt) के रूप में वृक्षों को लगाया जाता है ।

5. रेखीय भू-पट्‌टी पर पौधारोपण :

सडकों, रेलमार्गो, नहरों आदि के किनारे भूमि की रेखीय पट्‌टियों पर तेजी से बढ़ने वाले वृक्ष लगाये जाते हैं । इसे भी सामाजिक वानिकी कहते हैं ।

6. अवक्रमित वनों का पुनर्वनारोपण :

जिन वनों से भारी संख्या में वृक्षों को काट लिया गया है या जला दिया गया है ऐसे क्षेत्रों में मानव द्वारा वृक्षारोपण को अवक्रमित वनों का पुनर्वनारोपण कहते हैं ।

7. आमोद-प्रमोद वानिकी :

इस प्रकार की सामाजिक वानिकी प्राय: उद्यानों तथा मनोरंजन स्थलों में लगाई जाती है । इस प्रकार की वानिकी को सौन्दर्य बोधात्मक वानिकी के रूप में भी जाना जाता है ।

सामाजिक वानिकी के लिये निम्न वृक्ष उपयुक्त माने जाते हैं:

गन्ध सफेदा अथवा यूकेलिप्ट्स , पॉपलर , जामुन , सिरस , शीशम , इमली, बेर, सेन्जी इत्यादि ।

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